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Shayari

Kabhi Dosti ke sitam dekhte hain

कभी दोस्ती के सितम देखते हैं
कभी दुश्मनी के करम देखते हैं

कोई चहरा नूरे-मसर्रत से रोशन
किसी पर हज़ारों अलम देखते हैं

अगर सच कहा हम ने तुम रो पडोगे
न पूछों कि हम कितने गम देखते हैं

गरज़ उन की देखी, मदद करना देखा
और अब टूटता हर भरम देखते हैं

ज़ुबाँ खोलता है यहां कौन देखें
हक़ीक़त में कितना है दम देखते हैं

उन्हें हर सफ़र में भटकना पडा है
जो नक्शा न नक्शे-क़दम देखते हैं

यूँ ही ताका-झाँकी तो आदत नहीं है
मगर इक नज़र कम से कम देखते हैं

थी ज़िंदादिली जिन की फ़ितरत में यारों !
'यक़ीन' उन की आँखों को नम देखते हैं


Kabhi Kabhi Mere Dil Mein Khayal Aata hai

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तेरी जुल्फों कि नर्म छाओं में
गुज़रने पाती तो शादाब भी हो सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओ में खो भी सकती थी
...
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुजर रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे कि आरजू भी नहीं
...
न कोई जादह, न मंज़िल, न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर यूँ ही
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
------------------- साहिर लुधियानवी

 

 



 

 
 

 Raat bhar jaag ke tera intezaar kaun kare

रात भर जग के तेरा इंतज़ार कौन करे
झूठी उम्मीद पे दिल बेक़रार कौन करे
तेरी उल्फ़त पे तो मुझको यकीं है पूरा
तेरे वादों का मगर ऐतबार कौन करे |
वादा करता है किनारे का, लहर देता है
लाख ग़म सुख का महज़ एक पहर देता है
उम्र की राह कटी तब यह कहीं राज़ खुला
प्यार अमृत के बहाने ही ज़हर देता है |

 

 



 

 
 

Anguliya tham ke khud chalna sikhaya tha jise 



अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया, राह पे लाया था जिसे |
उसने पोछें ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रो के बहुत देर हंसाया था जिसे |
अब बड़ा होके मेरे सर पे चढ़ा आता है
अपने काँधें पे कुंवर हंस के बिठाया था जिसे |

 

 

 


  Zikra hota hai jab kayamat ka tere jalwo ki baat hoti hai

 

 

 



ज़िक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है
तू जो चाहे तो दिन निकलता है तू जो चाहे तो रात होती है

तू चली आए मुस्कुराती हुई तो बिखर जाएं हर तरफ़ कलियाँ
तू चली जाए उठ के पहलू से तो उजड़ जाएं फूलों की गलियाँ
जिस तरफ होती है नज़र तेरी उस तरफ क़ायनात होती है

तू निग़ाहों से ना पिलाए तो अश्क़ भी पीने वाले पीते हैं
वैसे जीने को तो तेरे बिन भी इस ज़माने में लोग जीते हैं
ज़िन्दगी तो उसी को कहते हैं जो गुज़र तेरे साथ होती है

 

 

 

 


  Haat chhute bhi to rishte nahin chhoda karte

 



हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते

 

 

 

 


  Aadatan tumne kar diye vaade

 



आदतन तुम ने कर दिये वादे
आदतन हम ने ऐतबार किया

तेरी राहों में हर बार रुक कर
हम ने अपना ही इन्तज़ार किया

अब ना माँगेंगे जिन्दगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया

 

 

 

 


  Mayoos to hoon vayade se tere, kuchh aas nahin kuchh aas bhi hai

 



मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ आस नहीं कुछ आस भी है.
मैं अपने ख्यालों के सदके, तू पास नहीं और पास भी है.

दिल ने तो खुशी माँगी थी मगर, जो तूने दिया अच्छा ही दिया.
जिस गम को तअल्लुक हो तुझसे, वह रास नहीं और रास भी है.

पलकों पे लरजते अश्कों में तसवीर झलकती है तेरी.
दीदार की प्यासी आँखों को, अब प्यास नहीं और प्यास भी है.

 

 

 

 


  Khoya hua hai aaj bhi pasti mein aadmi

 



खोया हुआ है आज भी पस्ती में आदमी
मिलने को उस के चांद पे नक्श़े-क़दम मिले

 

 

 

 


  Karte rahenge ham bhi khataye nai nai

 



करते रहेंगे हम भी ख़ताएं नई नई
तज्वीज़ तुम भी करना सज़ाएं नई नई

जब भी हमें मिलो ज़रा हंस कर मिला करो
देंगे फ़क़ीर तुम को दुआएं नई नई

 

 

 

 


  Apni marzi se kahaan apne safar ke ham hain

 



अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं |

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं |

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं |

 

 

 

 


  Sabki baat na maana kar, khud ko bhi pahchana kar

 

सबकी बात न माना कर
खुद को भी पहचाना कर

दुनिया से लड़ना है तो
अपनी ओर निशाना कर

बारिश में औरों पर भी
अपनी छतरी ताना कर

बाहर दिल की बात न ला
दिल को भी तहखाना कर

 

 

 

 

 

 


  Hai Khuda Se Iltaza ki Saath unka hi mile,
Gar Khalish Duniyaan mein phir aana hamaara ho gaya.

 

 



 


 



Hazaar rahen mud ke dekhi,
Kahin se koi sadaa na aayi.
Badi wafaa se nibhai tumne,
Hamaari thodi si bewafai.

Jahaa se tum mod mud gaye the,
Wo mod ab bhi wahi khade hai.
Ham apne pairo mein jaane kitne,
Bhawar lapete hue khade hain.

Badi wafa se nibhai tumne,
Hamaari thodi si bewafai.

 

 

 


  Kachche bakhiye ki tarah rishtey udhad jaate hain

 

कच्चे बखिए की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं
हर नए मोड़ पर कुछ लोग बिछड़ जाते हैं

यूँ हुआ दूरियाँ कम करने लगे थे दोनों
रोज़ चलने से तो रस्ते भी उखड़ जाते हैं

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